सवर्ण आयोग की अवधारणा एक गहरी साजिश

सवर्ण आयोग की अवधारणा गहरी साजिश

भाग - 1

विजेंद्र मेहरा

        हिमाचल प्रदेश में आजकल एक बहस छिड़ी हुई है। यह बहस जाति आधारित आरक्षण को बन्द करने, अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून को खत्म करने व सवर्ण आयोग के गठन को लेकर है। हालांकि यह बहस बेमानी है,बेईमानी व कपटतापूर्ण है क्योंकि यह बहस दलितों व वंचितों को मिलने वाले जाति आधारित आरक्षण तथा अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून को खत्म करने को लेकर है व यह प्रभावशाली तबके द्वारा एक सुनियोजित प्रेरित बहस है। बहस दुष्टतापूर्ण भी है क्योंकि यह सारी बहस सुविधाजनक तरीके से एक ओर प्रभावशाली तबके द्वारा स्वयं के लिए रचे सवर्ण जाति शब्द यानिकि अच्छे वर्ण व दूसरी ओर सदियों से समाज के वंचितों, पिछड़ों, दबे कुचलों, दलितों के मध्य केंद्रित है, जिन्हें सवर्ण अवर्ण मानते हैं यानिकि बुरे वर्ण। इस बहस का दोहरापन तो देखिए कि एक तरफ जाति आधारित आरक्षण व अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून को खत्म करने की बात हो रही है और दूसरी ओर इस बात को उठाने वाले जाति के आधार पर ही सामान्य जातियों के लिए सवर्ण आयोग गठित करने व इसके माध्यम से अपने उत्पीड़न को रोकने की मांग करते रहे हैं हालांकि उनका शायद ही कभी कोई शोषण या उत्पीड़न हुआ हो। इसी मांग पर हिमाचल प्रदेश की भाजपा  सरकार ने धर्मशाला में हुए शीतकालीन सत्र के पहले दिन 10 दिसम्बर 2021 को सामान्य वर्ग आयोग गठित करने की घोषणा करके अधिसूचना भी जारी कर दी तथा मध्य प्रदेश के बाद हिमाचल प्रदेश इस तरह का आयोग गठित करने वाला दूसरा राज्य बन गया। सरकार ने संवैधानिक व कानूनी पेंच को भांपते हुए सवर्ण आयोग के बजाए इसे सामान्य वर्ग आयोग का नाम दिया। वास्तव में आरक्षण व अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून को खत्म करने तथा सवर्ण आयोग के गठन के पीछे एक गहरी साज़िश है। इस साजिश के पीछे की  राजनीति, कैमिस्ट्री, हिस्ट्री, इकोनॉमिक व मैथेमेटिकल केलकुलेशन तथा समाज विज्ञान को समझना व इसका पर्दाफाश करके इसे बेनकाब करना हर संवेदनशील व समझदार नागरिक का फ़र्ज़ है क्योंकि आयोग हमेशा पीड़ितों के लिए बनते हैं न कि समाज के प्रभावशाली तबकों के लिए।
आखिर यह पूरी बहस पैदा क्यों हुई है? इसके लिए एक वैचारिक व राजनीतिक प्रतिबद्धता, चेतना, सोच, प्रोपेगेंडा व भौतिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। इसके लिए बखूबी एक ज़मीन तैयार की गई है। जाति प्रथा व जाति व्यवस्था भारतवर्ष में हज़ारों सालों से जड़ें जमाकर स्थापित है। इसे सुव्यवस्थित तरीके से समाज में न केवल स्थापित किया गया है अपितु इसे निरन्तर संचालित किया जाता रहा है। व्यवस्था का दोहरापन यह है कि हम बीमारी का ईलाज़ तो चाहते हैं परन्तु वह भी बगैर बीमारी की पहचान व शिनाख्त किये व बिना किसी डॉक्टर व दवाई के। यह चर्चा हर गली, कूचे, मोहल्ले, गांव, शहर में हो रही है कि जाति आधारित आरक्षण व अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून को हर हाल में तुरन्त ही खत्म होना चाहिए परन्तु इन चर्चाओं में जातिवाद, जातीय उत्पीड़न व भेदभाव के खात्मे की दूर-दूर तक कहीं कोई चर्चा नहीं है। आर्थिक तौर पर प्रभावशाली तबकों जिसका बहुमत सामान्य जातियों से आता है, के लिए सरकारी व निजी शैक्षणिक संस्थानों में पिछले दरवाजे से घुसाए गए आर्थिक आरक्षण, हालांकि इसे आरक्षण नाम नहीं दिया गया है परन्तु सच्चाई से सब वाकिफ हैं, पर भी ये चर्चाएं जान बूझ कर खामोश हैं। चर्चाओं में कई तरह के तर्क सामने आ रहे हैं जैसे कि जातिवाद है ही कहाँ? जातिवाद तो कब का खत्म हो गया है। पुरानी गलतियों के लिए वर्तमान पीढ़ी को क्यों सज़ा दी जा रही है? समाज के सब हिस्से एक जैसी ही सेवाएं ले रहे हैं व एक आज़ाद देश में एक साथ एक ही संविधान के दायरे में ही कार्यरत हैं। सब जातियों के बच्चे एक साथ स्कूलों में इकट्ठे पढ़ते हैं। अस्पतालों के दरवाजे सब के लिए बराबर खुले हैं। बस, ट्रेन, हवाई जहाज़ का सफर, बिजली व पानी आदि सुविधाएं जातिगत आधार पर नहीं बंटी हुई हैं। तो फिर आरक्षण क्यों जातिगत होना चाहिए? यह भी कहा जा रहा है कि आरक्षण तथा अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून का बेवजह बेहद गलत इस्तेमाल हो रहा है इसलिए इन्हें तत्काल निरस्त कर देना चाहिए।शासक वर्ग व प्रभावशाली तबकों के विचार ही वास्तव में समाज की दिशा निर्धारित करने वाले शासकीय विचार होते हैं व हर समाज में यही प्रभुत्वकारी होते हैं। वर्तमान सिस्टम में इन शासन करने वाले तबकों द्वारा अपने प्रभुत्व व प्रभावशाली विचारों के द्वारा यह बताने व प्रचारित करने की कोशिश की जा रही है कि जातीय भेदभाव, उत्पीड़न व शोषण बीते ज़मानों की बातें हैं व इन पर चर्चा करना बेमानी है। मानसिक व बौद्धिक दिवालियेपने में यहां तक कहा जा रहा है कि जातियां सामाजिक कार्यों के बंटवारे के सिवाए कुछ भी नहीं हैं। यह केवल वर्ण व्यवस्था व विधि का विधान है। इसलिए उनके अनुसार  जातिवाद की जड़ों को उखाड़ने की बात करने वाले निहायत मूर्ख व नासमझ हैं। हालांकि सब जानते हैं कि वर्ण व्यवस्था भी कार्यों का बंटवारा न होकर अनुत्पादकों द्वारा उत्पादकों के शोषण व लूट की ही व्यवस्था थी। उनके द्वारा तर्क प्रस्तुत किया जाता रहा है कि जाति व्यवस्था समाज के अनुशासित आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक नियंत्रण व संचालन का एक नियम मात्र है व इसके बगैर समाज का कोई महत्व व अस्तित्व ही नहीं है। यह सब एक छिपी हुई साज़िश के तहत सुनियोजित तरीके से हो रहा है। यह शोषण, दमन, अत्याचार, लूट, प्रभुत्व को न केवल जिन्दा रखने बल्कि उसे और ज़्यादा बढ़ाने व मजबूत करने की एक घोर साज़िश है व एक प्रमुख औज़ार है।अगर जाति प्रथा नहीं है व यह खत्म हो चुकी है तो फिर समाज में शादी ब्याह के रिश्ते तय करते वक्त किसी के भी द्वारा अपनी जाति को ही तवज्जो क्यों दी जाती है? अंतर्जातीय विवाह करने वालों को प्रताड़ित क्यों किया जाता है? उनको समाज से क्यों बहिष्कृत किया जाता है? उन पर भारी ज़ुर्माना क्यों लगाया जाता है? देश के कई राज्यों में खाप पंचायतों व ऑनर किलिंग के उदाहरण सबके सामने हैं। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में त्योहार के दौरान फूल एक दलित की गोद में गिरने पर उस दलित युवक को सवर्णों द्वारा क्यों पीट-पीट कर अधमरा किया जाता है? दलितों के मुद्दे उठाने व भ्रष्टाचार उजागर करने पर एक दलित अधिवक्ता, आरटीआई व सामाजिक कार्यकर्ता केदार सिंह जिन्दान की दिन - दिहाड़े हत्या कर दी जाती है। सड़क में कार के लिए पास मांगने पर शिमला के नेरवा क्षेत्र के रजत कुमार को सरेआम मार दिया जाता है। आज भी देश में सवर्णों और दलितों के मुर्दे जलाने की जगहें तक अलग हैं और पानी के स्रोत भी अलग। दलितों का प्रवेश मंदिरों में वर्जित है। उन्हें एक कर्मी के रूप में स्कूल में मिड डे मील बनाने की इजाज़त नहीं है व दलित बच्चों को स्कूलों में मध्याह्न भोजन ग्रहण करने के लिए अलग बिठाया जाता है। दलितों को शादी के लिए घोड़े तक पर बैठने की इजाज़त नहीं है चाहे दलित दूल्हा आईएएस अधिकारी ही क्यों न हो। हिमाचल प्रदेश के देव संस्थान में दलित देवताओं के बजन्तरी तो हो सकते हैं परन्तु देवताओं को सुरमयी धुनों में नचाने वाले दलित उन्हीं देवताओं व भगवान के मंदिर, जिन्हें बनाया भी उन्होंने ही है, वे उनमें प्रवेश नहीं कर सकते हैं। सवर्णों के घरों में कुत्ता या कोई जानवर तो रह सकता है जबकि दलितों की एंट्री सवर्णों के घरों में बैन है। अगर किसी ने ऐसी जुर्रत की तो उन्हें जान से हाथ धोना पड़ सकता है और पड़ा भी है।हिमाचल प्रदेश में दलितों की आबादी पूरे देश में पंजाब के बाद दूसरे स्थान पर है। प्रदेश की राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्था में सवर्णों का ही दबदबा व बोलबाला रहा है। दलितों की स्थिति दयनीय है। दलित भेदभाव व उत्पीड़न की घटनाएं हाल-फिलहाल में और भी ज़्यादा बढ़ी हैं। सामंती मूल्यों के वर्तमान दौर में भी जिंदा रहने के कारण प्रदेश में सवर्ण प्रभुत्व बड़े पैमाने पर स्थापित है जो विभाजनकारी शक्तियों व सवर्ण जातीय समूहों द्वारा सुव्यवस्थित तरीके से अब और ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। हालांकि प्रदेश में शिक्षा के प्रचार - प्रसार, जनवादी आंदोलन के विकास, दलित संगठनों व मंचों के उभार तथा दलितों के जातीय उत्पीड़न व भेदभाव के खिलाफ दृढ़तापूर्वक लड़ाई से प्रदेश के सामंती ढांचे को कड़ी चुनौती मिल रही है। जातीय भेदभाव, छुआछूत व विशेष तौर पर दलित उत्पीड़न के खिलाफ दलित पिछले कुछ समय से लामबंद होने लगे हैं। केदार जिन्दान, रजत कुमार व बिमला देवी की सवर्ण वर्चस्ववादियों द्वारा हत्या के बाद दलित समुदाय के लोग जातीय उत्पीड़न के खिलाफ न्याय के लिए भारी संख्या में सड़कों पर उतरे हैं। वे अपनी अनेकों आर्थिक व सामाजिक मांगों के लिए जागृत हुए हैं व उन्होंने प्रदेश की राजधानी शिमला में विधानसभा सहित प्रदेश के दूसरे कोनों में जबरदस्त प्रदर्शन किए हैं। सामंती चेतना के शिकार वर्चस्ववादी लोग यह सब सहन नहीं कर पा रहे हैं व इस से उनका वर्चस्ववादी नज़रिया व अहम आहत हो रहा है। उन्हें यह अपनी सदियों से चल रही सामंती सत्ता व सम्पत्ति को चुनौती प्रतीत हो रही है जहां पर आज भी दलित उनकी नज़रों में गुलाम हैं, उनके नौकर हैं व उनकी दया पर निर्भर रहने वाले लोग हैं।

हालांकि दलित शोषण मुक्ति मंच जैसे लोकतांत्रिक मंच दलितों व आम जनता की समस्याओं को उठाते हुए उनके प्रगतिशील समाधान की निरन्तर कोशिश कर रहे हैं। परन्तु देश में तीसरे सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे सोलह लाख बेरोजगारों व अर्ध बेरोजगारों की फौज तथा भारी बेरोजगारी ने हिमाचल प्रदेश में आरक्षण व अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून विरोधी सवर्ण आयोग के समर्थक आंदोलन को उर्वरक ज़मीन दे दी है व इसने आग में घी डालने का कार्य किया है। इस सब ने सभी जातियों के जातिगत संगठनों की क्षुद्र व तुच्छ पहचान की राजनीति को पनपने का खुला अवसर देकर आपस में टकराव की भी बुनियाद रख दी है जोकि भविष्य में हिमाचल प्रदेश जैसे प्रगतिशील राज्य की नींव को कमज़ोर करने का ही कार्य करेगी। नौकरियों के अभाव में सामान्य जातियों के युवाओं में यह भावना पनप रही है कि बेरोजगारी आरक्षण के कारण है जबकि हकीकत यह है कि नौकरियां हैं ही नहीं। वे शासक वर्ग व सत्तासीन सरकारों की रोज़गारहीन नीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के बजाए दलितों, आरक्षण व अनुसूचित जाति एवम जनजाति उत्पीड़न रोकथाम कानून को निशाना बना रहे हैं। सामंती मूल्यों व जातीय अहम के कारण हाल फिलहाल में दर्जनों दलितों की हत्याओं, जातीय भेदभाव व उत्पीड़न के घृणापूर्वक कार्यों को सवर्णों द्वारा न केवल जस्टिफाई किया जा रहा है बल्कि ग्लोरीफाई किया जा रहा है। इसका काउंटर रिएक्शन भी हो रहा है। सवर्णों की तरह ही दलितों की भी जातीय आधार पर गोलबंदी हो रही है। इस क्रिया और प्रितिक्रिया के खेल में प्रदेश के लोकतांत्रिक मूल्यों का कमज़ोर होना व प्रदेश की संघर्षशील जनता के एक बड़े हिस्से का प्रतिक्रियावादी ताकतों के हाथों में खिलौना बनना तय है। यही शासक वर्ग का एजेंडा व हथियार भी है कि कैसे पूंजीवादी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों व सामंती मूल्यों से पनप रहे आक्रोश को चतुराई से जनता में फूट डालकर दूसरी ओर मोड़ दिया जाए ताकि सरमायेदार लुटेरों की लूट पर कोई आंच न आए। इस तरह जनता अभिमन्यु की तरह हुक्मरानों व उनके पैरोकारों के इस चक्रव्यूह में फंस गई है जिसके भविष्य में गम्भीर परिणाम होना तय है।

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